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hindi

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    [घंटी]
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    बौद्ध धर्म में, हम यह सीखते हैं कि
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    हम जीवन के लिए
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    पर्याप्त परिस्थितियों
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    के साथ खुशी पा सकते हैं।
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    "पर्याप्तता का ज्ञान" नामक एक शिक्षा है।
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    जब हम सक्षम होते हैं निर्माण करने में,
    भ्रातृत्व और भगिनीत्व का,
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    पिता-पुत्र के रिश्ते का,
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    शिक्षक-छात्र संबंध का,
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    भले ही हम कम शानदार कार चलाते हों,
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    भले ही हम कम स्वादिष्ट भोजन खाते हों,
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    हमारी खुशी तब भी उतनी ही होती है।
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    बौद्ध धर्म में,
    हम पावन भूमि के बारे में बात करते हैं,
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    जो कि खुशी के प्रदेश का प्रतीक है।
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    प्लम विलेज में, हम वर्तमान क्षण
    की पावन भूमि में रहने का अभ्यास करते हैं।
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    जीवन के सारे चमत्कार
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    पहचाने और संपर्क किये जा सकते है
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    यदि हम इस क्षण नामक घर आ सकें।
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    यदि हम निर्माण करना जानते हैं
    भ्रातृत्व और भगिनीत्व का,
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    यदि हमें पोषित होते है,
    भ्रातृत्व और भगिनीत्व से,
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    उससे उत्पन्न हुई खुशी से,
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    हम एक सादा
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    फिर भी संतुष्ट और सुखी जीवन जी सकते हैं।
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    जब हम एक सरल
    जीवन खुशहाली से जीना जानते हैं,
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    तब हम पृथ्वी ग्रह के प्राकृतिक
    संसाधनों का शोषण नहीं करना चाहते।
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    हम
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    तब पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करते हैं,
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    और हम अपने पीछे एक विरासत छोड़ जाते हैं
    हमारे बच्चों के लिए।
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    इसलिए, यह जानना कि
    हमारे पास पहले से ही पर्याप्त है,
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    जो हमारे पास है उससे आसानी से संतुष्ट
    होना, कम इच्छाएं और लालसाएं रखना,
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    यह जीने का एक तरीका
    है जो ग्रह को बचा सकता है
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    और
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    हमारे बच्चों और पोते-पोतियों
    के लिए बेहतर भविष्य छोड़ सकता है।
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    मैं देखता हूँ
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    वर्तमान में हमारे जीने का तरीका
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    विनाश करता है
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    न केवल प्रकृति का पर मानव जाति का भी।
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    मैंने सुना है कि यहाँ Bình Định में,
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    युवाओं में हिंसक अपराध
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    लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।
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    अभी सुबह ही,
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    मुझे एक पत्र मिला।
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    इस पत्र में उन्होंने कहा,
    ''स्कूल में भी, 14 या 15 साल के छोटे बच्चे
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    गिरोह बनाते हैं,
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    और एक दूसरे के विरुद्ध आ जाते हैं
    सड़क पर खूनी लड़ाइयों और हत्याओं के लिए।"
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    छोटी-छोटी बातों पर,
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    वे आसानी से चीखने चिल्लाने लगते हैं।
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    हाल ही में, सोमवार 4 अप्रैल, 2005 को,
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    Trung Vuong
    वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल में एक त्रासदी घटी।
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    एक सहपाठी की जन्मदिन पार्टी में मामूली सी
    बात पर, वे चाकू और हंसिया लेकर स्कूल गए,
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    प्रतिद्वंद्वी सदस्यों का स्कूल के गेट
    पर उपस्थित होने का इंतजार किया
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    और अपने सहपाठियों को
    कई बार मृत्यु तक चाकू मार दिया।
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    ये हत्या का कृत्य क्रूर और निर्दयी था
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    जो केवल
    पेशेवर हत्यारी फिल्मों में पाया जाता था.
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    पश्चिम के साथ-साथ एशिया में भी,
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    औद्योगिक विकास
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    ने ऐसी सामाजिक बुराइयों को जन्म दिया है।
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    इसके अतिरिक्त,
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    आजकल के युवा फ़िल्मों, पत्रिकाओं और
    मीडिया उत्पादों का अत्याधिक उपभोग करते हैं
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    जिनमें चित्रात्मक दृश्यों
    द्वारा हिंसा और शत्रुता,
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    बदले के कार्य,
    और कामुक छवियां प्रदर्शित की जाती है।
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    इसलिए हमारे बच्चों ने
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    आसानी से इच्छाओं
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    और हिंसा और आक्रामकता का सार
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    इन मीडिया उत्पादों की सामग्री
    और छवियों से सीख लिया है।
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    इसीलिए ये सामाजिक बुराइयाँ
    वास्तविक जीवन में हमारे साथ घटित होती हैं।
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    बौद्ध धर्म में, हम यह सीखते हैं
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    कि हमें अपने शरीर,
    हृदय और दिमाग की रक्षा करनी चाहिए।
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    जब हम खाते-पीते हैं तो हमें
    सावधानी और ध्यान से खाना-पीना चाहिए
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    ताकि हम विषाक्त पदार्थ
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    अपने शरीर में न लाएं।
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    जब हम मीडिया उत्पादों का उपभोग करते
    हैं जैसे कि किताबें, पत्रिकाएँ, फ़िल्में,
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    वीडियो, फ़ोटो,
    हमें इनका सेवन सोच-समझकर करना होगा।
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    यदि हम ऐसे मीडिया
    उत्पादों का सेवन करते हैं
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    जिनमें कामुक उत्तेजना जैसे विषाक्त पदार्थ
    होते हैं, क्रोध, बदला लेने की चाहत, हिंसा,
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    तब
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    वे हमारे दिल और दिमाग
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    और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों
    के दिलों और दिमागों में जहर बन जाते हैं।
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    इसलिए पांचवे सचेतन प्रशिक्षण का अनुसरण
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    यानी सचेत उपभोग,
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    हमारे समाज को उन
    सामाजिक कुरीतियों से बचाये रख सकता है।
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    इसीलिए
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    शाक्यमुनि बुद्ध ने
    जो बातें सिखाईं उनमें से एक
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    जिसे हमें गंभीरता से लेना चाहिए
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    वह यह है कि हमें कभी भी अपने अंदर
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    हिंसा और आक्रामकता,
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    कामुक उत्तेजना और कामुक सुख,
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    क्रोध और बदला लेने की संभावनाओं
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    को उपभोग के माध्यम से मजबूत नहीं करना
    चाहिए और उन बीजों को सींचना नहीं चाहिए।
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    इसीलिए
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    यदि हम वास्तव में
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    अपने बच्चों और
    पोते-पोतियों की रक्षा करना चाहते हैं,
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    यदि हम वास्तव में
    अपने समाज की रक्षा करना चाहते हैं,
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    तो हमें सचेतनता के मार्ग पर चलना होगा,
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    जिसका अर्थ है हर चीज़ का
    उत्पादन और उपभोग सोच-समझकर करना।
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    यदि हम अपने समाज को
    बद से बदतर नहीं होने देना चाहते
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    तो हमारे देश के शिक्षकों,
    शिक्षाविशरदों और राजनेताओं को
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    इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
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    मैं प्रश्नों के उत्तर देने के लिए
    कुछ समय बचाने हेतु यहीं रुकना चाहूँगा।
Title:
hindi
Description:

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Video Language:
Vietnamese
Duration:
06:04

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