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विलियम ऊरी: 'ना' से 'हाँ' का सफ़र

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    ह्म्म, कठिन मध्यस्थता का मसला
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    मुझे मेरी एक पसंदीदा कहानी की याद दिलाता है,
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    मध्यपूर्वी दुनिया से,
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    एक ऐसे आदमी की जो अपने तीन बेटों के लिये १७ ऊँटों की विरासत छोड गया था।
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    पहले बेटे के लिये उसने आधे ऊँट मुकर्रर किये थे;
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    दूसरे के लिये, एक तिहाई;
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    और सबसे छोटे बेटे के लिये, ऊँटों का नवाँ हिस्सा।
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    तीनों बेटे ऊँटों का फ़ैसला करने बैठे।
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    १७ न तो दो से भाग खाता है।
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    न ही उसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है।
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    और ९ से भी उसे भाग नहीं दिया जा सकता।
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    अब भाइयों में अन-बन शुरु हो गयी।
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    और अंत में, मरता क्या न करता,
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    वो एक बुद्धिमान बुढिया के पास सलाह के लिये पहुँचे।
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    बुद्धिमान बुढिया ने उनकी समस्या पर देर तक विचार किया,
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    और फ़िर उसने वापस आ कर कहा,
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    "देखो, मुझे नहीं पता कि मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ या नहीं,
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    लेकिन अगर तुम्हें चाहिये, तो तुम मेरा ऊँट ले जा सकते हो।"
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    तो अब उनके पास १८ ऊँट हो गये।
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    पहले बेटे ने अपना आधा हिस्सा ले लिया - १८ का आधा ९ होता है।
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    मंझले बेटे ने एक-तिहाई ले लिया - १८ का तिहाई ६ होता है।
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    और सबसे छोटे बेटे ने नवाँ हिस्सा लिया --
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    १८ का नवाँ हिस्सा दो होता है।
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    ९, ६, और २ मिला कर कुल १७ होते हैं।
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    तो उनके पास एक ऊँट बच गया।
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    और उसे उन्होंने उस बुढिया को वापस कर दिया।
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    (हँसी)
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    अब अगर आप इस कहानी पर गौर करें,
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    तो ये काफ़ी करीब है
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    उन स्थितियों के, जो हमें समझौते करते समय झेलनी होती हैं।
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    वो इसी १७ ऊँटों वाली स्थिति से शुरु होती है - जिनका निपटान असंभव लगता है।
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    कैसे भी हो, हमें करना ये होता है कि
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    हम उन स्थितियों से बाहर निकल कर देखें, बिलकुल उस बुद्धिमान बुढिया की तरह,
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    और एक नये नज़रिये से स्थितियों पर गौर करें
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    और कहीं से उस अट्ठारहवें ऊँट को प्रकट करें।
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    दुनिया के कठिन मसलों में इस अट्ठारहवें ऊँट की खोज़ ही
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    मेरे जीवन की साधना रही है।
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    मुझे मानव-जाति इन तीन भाइयों जैसी ही लगती है;
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    हम सब एक परिवार हैं।
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    और ये तो वैज्ञानिक तौर पर भी साबित हो चुका है,
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    और सूचना क्रान्ति के चलते,
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    इस ग्रह के सारे कबीले, लगभग १५,००० कबीले,
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    एक दूसरे से संपर्क में आ गये हैं।
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    और ये बहुत बडा पारिवारिक सम्मेलन है।
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    और बिलकुल पारिवारिक सम्मेलनों की तरह,
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    इसमें सब कुछ केवल शांति से, मज़े से नहीं होता है।
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    बहुत विवाद भी उत्पन्न होते हैं।
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    और असली प्रश्न तो ये है, कि
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    हम इन विवादों से कैसे निपतें?
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    हम अपने गहरे पैठे हुए मतभेदों से कैसे निपटें,
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    जब कि हम लोग हरदम लडने को तैयार रहते हैं
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    और मानव महान ज्ञाता हो गया है
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    हाहाकार मचा सकने वाले हथियारों का।
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    प्रश्न असल में ये है।
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    जैसा कि मैने लगभग पिछले तीस साल --
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    या शायद चालीस --
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    दुनिया भर में सफ़र करते हुए बिताये हैं,
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    अपना काम करते हुए, विवादों का हिस्सा बनते हुए
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    युगोस्लाविया से ले कर मध्य-पूर्व तक,
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    चेचेन्या से ले कर वेनेज़ुअला तक,
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    हमारी दुनिया के कुछ सबसे बडे और कठिन विवादों के दरम्यान,
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    और मै स्वयं से हमेशा यही प्रश्न पूछता आया हूँ।
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    और शायद कुछ हद तक मुझे ये पता लग गया है,
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    कि शान्ति का राज़ क्या है।
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    ये असल में आशचर्यजनिक रूप से साधारण है।
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    आसान नहीं है, मगर साधारण है।
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    और तो और, ये नया भी नहीं है।
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    हो सकता है कि ये हमारी प्राचीन मानव-संस्कृति का अहम हिस्सा रहा हो।
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    और शान्ति का राज हम खुद हैं।
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    ये हम सब ही हैं
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    जो कि समाज के रूप में
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    विवादों के आसपास मौजूद हो कर
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    एक सकारात्मक भागीदारी निभा सकते हैं।
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    मैं उदाहरण के रूप में एक किस्सा सुनाता हूँ।
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    करीब २० साल पहले, मैं दक्षिणी अफ़्रीका में था,
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    वहाँ के विवाद में शामिल गुटों के साथ काम करते हुए,
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    और मेरे पास एक महीन का अतिरिक्त समय था,
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    तो मैने वो समय
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    सैन बुश्मैन आदिवासियों के साथ बिताया।
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    मैं उनके बारे में जानने में उत्सुक था, खासकर कि वो अपने विवाद कैसे हल करते हैं।
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    क्योंकि, जितना मुझे पता था,
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    वो सब शिकारी या संग्रहजीवी थे,
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    काफ़ी हद तक आदिमानवों सरीका जीवन व्यतीत करने वाले,
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    जैसा कि मानवों ने अपने ९९ प्रतिशत इतिहास में बिताया है।
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    और इनके पास जहर-बुझे तीर होते हैं जिन्हें ये शिकार के लिये इस्तेमाल करते हैं--
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    एकदम मारक तीर।
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    तो ये कैसे अपने विवादों का हल ढूँढते हैं?
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    और पता है, मैनें क्या पाया --
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    कि जब भी उनके दलों में लोगों को गुस्सा आता है,
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    कोई जाकर पहले वो ज़हर-बुझे तीर झाडियों में छुपा देता है,
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    फ़िर सब लोग एक गोला बना कर ऐसे बैठ जाते हैं,
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    और फ़िर वो बातचीत करते जाते है, करते जाते हैं, करते जाते हैं।
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    इसमें उन्हें दो दिन, तीन, या फ़िर चार दिन भी लग सकते हैं,
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    मगर वो तब तक नहीं रुकते
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    जब तक कि उन्हें कोई हल न मिल जाये,
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    या फ़िर, विवाद करने वाले सुलह न कर लें।
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    और यदि तब भी गुस्सा शांत न हो,
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    तो वो किसी को अपने रिश्तेदारों से मिलने भेज देते हैं
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    शांत होने के लिये।
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    और मेरे ख्याल से इसी व्यवस्था
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    के चलते, हम सब आज तक जीवित बचे है,
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    हमारी लडाकू पॄवत्तियों के मद्देनज़र।
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    इस व्यवस्था को मैं तीसरा-पक्ष कहता हूँ।
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    क्योंकि यदि आप ध्यान दें,
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    अक्सर जब भी हम विवाद के बारे में सोचते हैं, या बताते हैं,
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    तो उस में हमेशा दो पक्ष निहित होते हैं।
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    अरब बनाम इस्राइली, मज़दूर बनाम प्रबंधन,
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    पति बनाम पत्नी, रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट,
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    मगर अक्सर जो हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं,
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    वो ये है कि हमेशा एक तीसरा पक्ष होता है।
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    और वो तीसरा पक्ष है आप और मैं,
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    आसपास का समाज,
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    दोस्त, और सहयोगी,
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    परिवार के सदस्य, पडोसी।
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    और हम सब उसमें अभूतपूर्व सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।
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    शायद सबसे मौलिक तरीका
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    जिस से कि तीसरा पक्ष मदद कर सकता है,
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    ये है कि विवादी जुटों को बतायें कि दाँव पर क्या लगा है।
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    बच्चों के लिये, परिवार के लिये,
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    समाज के लिये, और भविष्य के लिये,
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    हमें लडना छोड कर, बातचीत शुरु करनी होगी।
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    क्योंकि, मुद्दा ये है,
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    कि जब हम लडाई का हिस्सा होते हैं,
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    तो अपना आपा खोना बहुत आसान होता है।
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    तुरंत भडक उठना भी बहुत आसान होता है।
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    और मानव-जाति तो जैसे प्रतिक्रिया की मशीन है।
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    जैसा कि कहा जाता है,
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    जब आप गुस्सा हैं, तो आप वो बहतरीन भाषण देंगे
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    जिसका आपको हमेशा पछतावा रहेगा।
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    और इसलिये तीसरा पक्ष हमेशा हमें ये याद दिलाता रह सकता है।
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    ये तीसरा पक्ष हमें बालकनी में जाने में मदद करता है,
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    जो कि सोच-विचार की जगह का रूपक है
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    जहाँ हम सोच सकें कि हमें असल में चाहिये क्या।
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    मैं आपको अपने खुद के मध्यस्तता के अनुभव से एक किस्सा सुनाता हूँ।
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    कुछ साल पहले, मैं एक मध्यस्त के रूप में
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    एक बहुत कठिन वार्ता में शामिल था
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    रूस के नेताओं
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    और चेचेन्या के नेताओं के बीच।
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    और जैसा कि आपको पता ही है, उस समय एक युद्ध चल रहा था।
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    और हम हेग्य में मिले,
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    शांति महल में (पीस पैलेस),
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    उसी कमरे में जहाँ युगोस्लावी युद्ध अपराधों की कचहरी
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    चल रही थी।
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    और हमारी बातचीत शुरुवात में ही हिचकोले खाने लगी
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    जब चेचेन्या के उप-राष्ट्रपति ने
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    रूसियों की तरफ़ उँगली उठा कर कहा,
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    "आपको यहीं बैठे रहना चाहिये,
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    क्योंकि हो सकता है आप पर भी युद्ध-अपराधों का मुकदमा चले।"
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    और फ़िर वो मेरी ओर मुखातिब हो कर बोले,
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    "तुम तो अमरीकी हो।
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    देखो तुम अमरीकियों ने प्यूर्टो रिको में क्या किया है।"
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    और मेरे दिमाग ने तुरंत सोचना शुरु किया, "प्यूर्टो रिको? इसकी बात का मैं क्या जवाब दूँ?"
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    मैने प्रतिक्रिया करनी शुरु कर दी थी,
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    मगर तभी मुझे बालकनी मे जाने वाली बात याद आ गयी।
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    और जब उन्होंने बोलना बंद किया,
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    और सभी ने मेरी ओर जवाबी प्रतिक्रिया के लिये देखा,
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    बालकनी वाली सोच के चलते, मैं उनक उल्टा धन्यवाद देने में सक्षम हो सका,
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    और मैने कहा, "मैं अपने देश के प्रति आपकी आलोचना का सम्मान करता हूँ,
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    और इसे मित्रवत व्यवहार का लक्षण मानता हूँ कि
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    कम से कम हम खुल कर मन की बात बोल तो रहे हैं।
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    और आज हम यहाँ प्यूर्टो रिको या किसी और बात के लिये नहीं मिल रहे हैं।
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    हम यहाँ इसलिये हैं कि हम एक हल ढूँढ सकें जिस से कि
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    चेचेन्या में हो रह दुख और खून-खराबा बंद हो सके।"
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    बातचीत फ़िर से राह पर आ गयी।
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    तीसरे पक्ष का यही काम होता है,
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    कि वो विवाद में फ़ंसे पक्षों को बालकनी तक जाने में मदद करें।
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    चलिये मैं आपको ले चलता हूँ
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    विश्व के सबसे कठिन माने जाने वाली बहस के,
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    या शायद वास्तव में सबसे कठिन बहस के, ठीक बीच
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    मध्य-पूर्व में।
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    प्रश्न है: यहाँ तीसरा पक्ष कहाँ है?
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    यहाँ हम बालकनी में जाने की बात कैसे सोच सकेंगे?
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    अब मैं ये नाटक नहीं करूँगा कि
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    मेरे पास मध्य-पूर्व समस्या का समाधान है,
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    पर मेरे ख्याल से मेरे पास समाधान की ओर जाने का पहला कदम है,
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    वस्तुतः पहला कदम,
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    ऐसा कुछ जो हम सब तीसरे पक्ष के रूप में कर सकते हैं।
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    चलिये आप से पहले एक प्रश्न पूछता हूँ।
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    आप में कितनों ने
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    पिछले सालों में
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    स्वयं को पाया है मध्य-पूर्व की चिंता करते और
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    ये सोचते कि कोई क्या कर सकता है?
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    उत्सुक्तावश, कितने आप में से?
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    ठीक, तो हम में ज्यादातर लोगों ने।
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    और ये हम से इतना दूर है।
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    हम आखिर इस विवाद पर इतना ध्यान क्यों देते हैं?
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    क्या ये अत्यधिक लोगों की मृत्यु के चलते है?
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    इस के कई सौ गुना लोग मरते हैं
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    अफ़्रीका के विवादों में।
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    नहीं, ये इस से जुडी कहानी की वजह से है,
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    कि हम सब व्यक्तिगत तौर पर जुडे महसूस करते हैं
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    इस कहानी से।
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    चाहे हम ईसाई हों, मुसलमान हों, या फ़िर यहूदी,
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    और आस्तिक हों या नास्तिक,
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    हमें लगता है कि हमारा कुछ हिस्सा इसमें शामिल है।
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    कहानियों की अपनी महत्ता होती है। एक मानव-विज्ञानी होने के नाते मैं जानता हूँ।
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    हम कहानियों के ज़रिये अपने ज्ञान को आगे देते हैं।
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    उनसे हमारे जीवन को अर्थ मिलता है।
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    इसलिये ही हम सब यहाँ टेड में हैं, कहानियाँ सुनाने।
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    कहानियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं।
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    और मेरा प्रश्न है,
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    हाँ, चलिये कोशिश करके सुलझाते हैं राजनीतिक उलझन
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    जो मध्य-पूर्व में है,
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    लेकिन एक नज़र उस कहानी पर भी डालते हैं।
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    चलिये मसले की जड तक पहुँचने की कोशिश करते हैं।
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    चलिये देखते हैं कि क्या इस पर तीसरा पक्ष लागू होगा।
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    इसका क्या मतलब हुआ? यहाँ कहानी क्या है?
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    मानव विज्ञानी होने के नाते, हमें पता है कि
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    हर संस्कृति के उद्गम की एक कहानी होती है।
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    मध्य-पूर्व के उद्गम की कहानी क्या है?
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    सीधे सीधे, कहानी ये है:
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    ४००० साल पहले, एक आदमी और उसके परिवार
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    ने मध्य-पूर्व के आरपार पद-यात्रा की
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    और दुनिया हमेशा हमेशा के बदल गयी।
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    और वो आदमी, जैसा कि सर्वविदित है,
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    अब्राहम था।
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    और वो एकता का पुजारी थी,
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    उसके परिवार की एकता।
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    वो हम सब का पिता था।
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    मगर मसला सिर्फ़ ये नहीं कि वो क्या पूजता था, बल्कि ये कि उसका संदेश क्या था।
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    उसका मूल संदेश भी एकता का ही था,
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    सबके आपस में जुडे होने का, और सबके बीच एकता का।
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    और उसका मौलिक मूल्य था सम्मान,
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    और अन्जान लोगों के प्रति दया का भाव।
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    वो इसिलिये जाना जाता है, अपनी सत्कार भावना के लिये।
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    तो इस लिहाज से,
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    वो तीसरे पक्ष का प्रतीक है
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    मध्य-पूर्व के लिये।
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    वो हमें ये याद दिलाता है कि
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    हम सब एक बडी परिकल्पना के हिस्से मात्र हैं।
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    तो आप कैसे --
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    थोडा रुक कर सोचिये।
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    आज हम आतंकवाद का बोझा ढो रहे हैं।
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    आतंकवाद आखिर है क्या?
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    आतंकवाद है कि एक मासूम अजनबी को पकडिये,
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    और उसे उस दुश्मन के माफ़िक मानिये जिसे आप मार देंगे
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    डर पैदा करने के लिये।
  • 9:17 - 9:19
    और आतंकवाद का विपरीत क्या है?
  • 9:19 - 9:21
    ये कि आप एक मासूम अजनबी से मिले,
  • 9:21 - 9:23
    और उससे उस दोस्त के माफ़िक बर्ताव किया,
  • 9:23 - 9:26
    जिसे आप अपने घर बुलायेंगे
  • 9:26 - 9:28
    उस के साथ दख-सुख बाँटेंगे, और समझ बढायेंगे,
  • 9:28 - 9:31
    सम्मान देंगे, प्यार देंगे।
  • 9:31 - 9:33
    तो अगर ऐसा हो कि
  • 9:33 - 9:36
    आप अब्राहम की कहानी उठायें,
  • 9:36 - 9:38
    जो कि तीसरे पक्ष की कहानी है,
  • 9:38 - 9:40
    और अगर उसे ऐसा कर दें --
  • 9:40 - 9:43
    क्योंकि अब्राहम सत्कार भावना का प्रतीक है --
  • 9:43 - 9:46
    क्या हो अगर ये आतंकवाद के खिलाफ़ एक दवाई हो जाये?
  • 9:46 - 9:48
    क्या हो अगर ये कहानी टीका बन जाये
  • 9:48 - 9:50
    मजहबी असहिष्णुता के खिलाफ़?
  • 9:50 - 9:53
    आप उस कहानी में जीवन कैसे फ़ूँक सकेंगे?
  • 9:53 - 9:55
    देखिये सिर्फ़ कहानी सुना भर देना काफ़ी नहीं है --
  • 9:55 - 9:57
    वो काफ़ी शक्तिशाली है --
  • 9:57 - 9:59
    मगर लोगों को कहानी को अनुभव कर पाना ज़रूरी है।
  • 9:59 - 10:02
    उन्हें उस कहानी को जी पाना ज़रूरी है। वो आप कैसे करेंगे?
  • 10:02 - 10:05
    और ये मेरी सोच थी कि ऐसा कैसे होगा।
  • 10:05 - 10:07
    और यहीं से पहले कदम की शुरुवात है।
  • 10:07 - 10:09
    क्योंकि एक साधारण तरीका ये कर पाने का है कि
  • 10:09 - 10:12
    आप पद-यात्रा के लिये निकल पडें।
  • 10:12 - 10:15
    आप अब्राहम के पदचापों का अनुसरण करते हुये पदयात्रा पर निकलें
  • 10:15 - 10:18
    आप अब्राहम के रास्ते चलें।
  • 10:18 - 10:21
    क्योंकि पदयात्रा में बडी ताकत होती है।
  • 10:21 - 10:24
    मैं, एक मानव-विज्ञानी होने के नाते, जानता हूँ कि पद-यात्राओं ने ही हमें मनुष्य बनाया है।
  • 10:24 - 10:26
    ये गजब है कि जब आप चलते हैं,
  • 10:26 - 10:28
    तो आप अगल-बगल चलते हैं
  • 10:28 - 10:31
    एक ही दिशा में।
  • 10:31 - 10:33
    और अगर मै आपके सामने से आऊँ
  • 10:33 - 10:36
    और इतना करीब आ जाऊँ,
  • 10:36 - 10:39
    तो आपको भय महसूस होगा।
  • 10:39 - 10:41
    लेकिन अगर मैं आपके कंधे से कंधा मिला कर चलूँ,
  • 10:41 - 10:43
    चाहे आपको बिल्कुल छूते हुये भी,
  • 10:43 - 10:45
    तो कोई समस्या नहीं है।
  • 10:45 - 10:47
    अगल बगल चलते समय आखिर कौन लडता है?
  • 10:47 - 10:50
    इसिलिये, जब मसले हल करते समय, स्थिति कठिन हो जाती है,
  • 10:50 - 10:52
    लोग जंगलों में पद-यात्रा के लिये निकल जाते हैं।
  • 10:52 - 10:54
    तो मुझे ये विचार आया कि
  • 10:54 - 10:56
    क्यों न मैं प्रेरित करूँ
  • 10:56 - 10:58
    ऐसा रास्ता --
  • 10:58 - 11:01
    सिल्क रूट जैसा, या अप्लेशियन रास्ते के जैसा --
  • 11:01 - 11:03
    जो कि ठीक वो ही हो
  • 11:03 - 11:05
    जो अब्राहम ने लिया था।
  • 11:05 - 11:07
    लोगों ने कहा, "ये पागलपन है। नहीं हो सकता।
  • 11:07 - 11:10
    तुम अब्राहम के रास्ते पर नहीं चल सकते। ये बहुत खतरनाक है।
  • 11:10 - 11:12
    आपको तमाम सारी सीमाओं को पार करना होगा।
  • 11:12 - 11:14
    ये मध्य-पूर्व के करीब दस अलग अलग देशों से गुज़रता है,
  • 11:14 - 11:16
    क्योंकि ये उन सब को जोडता है।"
  • 11:16 - 11:18
    तो हमने हार्वार्ड में इस विचार पर अध्ययन किया।
  • 11:18 - 11:20
    बारीकी से इसे समझा।
  • 11:20 - 11:22
    और फ़िर कुछ साल पहले, हम ने एक दल बना कर,
  • 11:22 - 11:24
    करीब १० देशों के २५ लोगों का,
  • 11:24 - 11:26
    ये देखने का फ़ैसला किया कि क्या हम अब्राहम के रास्ते पर चल पायेंगे,
  • 11:26 - 11:29
    उनके जन्मस्थान उर्फ़ा शहर से शुरु कर,
  • 11:29 - 11:32
    जो दक्षिणी तुर्की, उत्तरी मेसोपोटामिया में है।
  • 11:32 - 11:35
    तो हमने एक बस ली और थोडी पैदल यात्रा के उपरांत
  • 11:35 - 11:37
    हम हर्रान पहुँचे,
  • 11:37 - 11:40
    जहाँ से, बाइबिल के अनुसार, उन्होंने अपनी यात्रा शुरु की थी।
  • 11:40 - 11:42
    फ़िर हमने सीमा पार की और सीरिया गये, फ़िर अलेप्पो,
  • 11:42 - 11:44
    जिसका नाम अब्राहम पर ही पडा है।
  • 11:44 - 11:46
    हम दमसकस गये,
  • 11:46 - 11:48
    जिसका इतिहास अब्राहम से जुडा है।
  • 11:48 - 11:51
    फ़िर हम उत्तरी जोर्डन गये,
  • 11:51 - 11:53
    येरुसलम गये,
  • 11:53 - 11:56
    जो कि पूरी तरह से अब्राहम से बारे में है, फ़िर बेतलेहम,
  • 11:56 - 11:58
    और फ़िर आखिर में वहाँ जहाँ वो दफ़न हैं,
  • 11:58 - 12:00
    हब्रोन में।
  • 12:00 - 12:02
    तो हम लगभग गर्भाशय से कब्र तक गये।
  • 12:02 - 12:05
    हमने ये दिखाया कि ऐसा हो सकता है। ये बहुत ही गजब की यात्रा थी।
  • 12:05 - 12:07
    आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ।
  • 12:07 - 12:09
    आप में से कितनों को ऐसा अनुभव हुआ है
  • 12:09 - 12:11
    कि किसी अजनबी जगह में,
  • 12:11 - 12:13
    या अजनबी देश में,
  • 12:13 - 12:16
    पूरी तरह से, सौ प्रतिशत अनजान व्यक्ति,
  • 12:16 - 12:19
    आप तक आये और आपसे प्यार की दो बात करे,
  • 12:19 - 12:21
    आपको अपने घर बुलाये, कुछ खातिरदारी करे,
  • 12:21 - 12:23
    कॉफ़ी पिलाये, या फ़िर खाने का निमंत्रण दे?
  • 12:23 - 12:25
    आप में से कितनों के साथ ऐसा हुआ है?
  • 12:25 - 12:27
    देखिये यही है मुद्दे की बात,
  • 12:27 - 12:29
    जो अब्राहम-पथ में निहित है।
  • 12:29 - 12:31
    क्योंकि आप यही होता पाते है, जब आप मध्य-पूर्व के इन गाँवों मे जाते हैं
  • 12:31 - 12:33
    जहाँ आप बुरे बर्ताव की आशा रखते हैं,
  • 12:33 - 12:35
    और आपको आश्चर्यजनक स्वागत मिलता है,
  • 12:35 - 12:37
    और सब अब्राहम से जुडे होने से।
  • 12:37 - 12:39
    अब्राहम के नाम पर,
  • 12:39 - 12:41
    "आइये मैं आपको कुछ खाने को देता हूँ।"
  • 12:41 - 12:43
    तो हमें ये पता लगा कि
  • 12:43 - 12:46
    अब्राहम महज एक किताबी किरदार नहीं है इन लोगों के लिये,
  • 12:46 - 12:49
    वो जीवित है, उनके बीच रोज़ाना।
  • 12:49 - 12:51
    और संक्षेप में कहूँ,
  • 12:51 - 12:53
    तो पिछले कुछ सालों में,
  • 12:53 - 12:55
    हज़ारों लोगों ने
  • 12:55 - 12:57
    अब्राहम-पथ के कुछ भागों पर
  • 12:57 - 12:59
    मध्य-पूर्व में चलना शुरु कर दिया है,
  • 12:59 - 13:02
    वहाँ के लोगों का स्वागत-सत्कार स्वीकार करते हुए।
  • 13:02 - 13:04
    उन्होने चलना शुरु किया है
  • 13:04 - 13:06
    इज़रायल और फ़िलिस्तीन में,
  • 13:06 - 13:08
    जोर्डन में, तुर्की में, सीरिया में।
  • 13:08 - 13:10
    ये बेहद अलग अनुभव है।
  • 13:10 - 13:12
    आदमी, औरत, युवा, वृद्ध --
  • 13:12 - 13:15
    आदमियों से ज्यादा औरतें, सच में।
  • 13:15 - 13:17
    और जो चल नहीं सकते,
  • 13:17 - 13:19
    जो वहाँ अभी तक नहीं जा सकते,
  • 13:19 - 13:21
    उन लोगों ने पद-यात्राएँ आयोजित करना शुरु कर दिया है
  • 13:21 - 13:23
    अपने शहरों, और अपने ही देशों मे।
  • 13:23 - 13:25
    सिनसिनाती में, उदाहरण के लिये, एक पद-यात्रा आयोजित होती है
  • 13:25 - 13:27
    एक चर्च से एक मस्जिद से होते हुए, एक यहूदी मंदिर तक
  • 13:27 - 13:29
    और फ़िर सब साथ में अब्राहम-भोज करते है।
  • 13:29 - 13:31
    उसे अब्राहम पथ दिवस कहा जाता है।
  • 13:31 - 13:33
    साओ पालो, ब्राज़ील में तो ये वार्षिक उत्सव बन चुका है,
  • 13:33 - 13:35
    हज़ारों लोगों के दौडने के लिये,
  • 13:35 - 13:37
    एक कल्पित अब्राहम पथ पर,
  • 13:37 - 13:39
    अलग अलग समुदायों को जोडने के लिये।
  • 13:39 - 13:42
    मीडिया भी इस पर खूब लिखती है, उन्हें ये बेहद पसंद है।
  • 13:42 - 13:44
    वो अपना ध्यान इस पर लुटाते है
  • 13:44 - 13:46
    क्योंकि ये देखने में बेहतरीन है,
  • 13:46 - 13:48
    और इस विचार को आगे बढाता है,
  • 13:48 - 13:50
    कि अब्राहम की तरह ही स्वागत
  • 13:50 - 13:52
    और दया की भावना अजनबियों के प्रति रखी जाये।
  • 13:52 - 13:54
    और अभी कुछ हफ़्ते पहले ही,
  • 13:54 - 13:56
    एन.पी.आर ने इस पर कहानी लिखी थी।
  • 13:56 - 13:58
    पिछले महीने,
  • 13:58 - 14:00
    इस पर गार्डियन अखबार ने लिखा था,
  • 14:00 - 14:03
    मैनचेस्टर से निकलने वाले गार्डियन ने --
  • 14:03 - 14:06
    पूरे दो पन्नों की रपट।
  • 14:06 - 14:09
    और उन्होंने एक ग्रामीण का संदेश भी शामिल किया था
  • 14:09 - 14:12
    जिसने कहा, "ये पद-यात्रा हमें दुनिया से जोडती है।"
  • 14:12 - 14:15
    उसने कहा कि ये एक रोशनी की तरह है जो हमारे जीवन में उजाला करती है
  • 14:15 - 14:17
    हमें आशा दे कर।
  • 14:17 - 14:19
    और देखिये इसी सब पर ये आधारित है।
  • 14:19 - 14:22
    मगर ये सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक नहीं है,
  • 14:22 - 14:24
    ये आर्थिक भी है,
  • 14:24 - 14:26
    क्योंकि जब लोग चलते है, तो वो पैसे भी खर्च करते हैं।
  • 14:26 - 14:29
    और उम अहमद नाम की इस महिला,
  • 14:29 - 14:32
    जो कि उत्तरी जोर्डन में इस रास्ते पर ही रहती है।
  • 14:32 - 14:34
    ये बेहद गरीब है।
  • 14:34 - 14:37
    काफ़ी हद तक दृष्टि-विहीन है, उसका पति काम नहीं कर सकता है,
  • 14:37 - 14:40
    और उस के सात बच्चे हैं।
  • 14:40 - 14:42
    मगर वो एक काम कर सकती है - खाना पकाना।
  • 14:42 - 14:45
    तो उसने पद-यात्रियों के दलों के लिये खाना पकाना शुरु कर दिया है,
  • 14:45 - 14:48
    जो उसके गाँव से निकलते है, और उसके घर में खाना खाते हैं।
  • 14:48 - 14:50
    वो ज़मीन पर बैठते है।
  • 14:50 - 14:52
    उस के पास मेज़ ढकने का कपडा तक नहीं है।
  • 14:52 - 14:54
    और वो बहुत ही स्वादिष्ट खाना पकाती है
  • 14:54 - 14:57
    जो कि आसपास के खेतों में उगने वाले मसालों से बना होता है।
  • 14:57 - 14:59
    और इस वजह से और भी पद-यात्री वहाँ आते हैं।
  • 14:59 - 15:01
    और अब तो उसने पैसे कमाने भी शुरु कर दिये है,
  • 15:01 - 15:03
    अपने परिवार के सहारे के लिये।
  • 15:03 - 15:06
    और उसने वहाँ हमारी टीम को बताया,
  • 15:06 - 15:09
    "आपने मुझे उस गाँव में इज़्ज़्त दिलायी है
  • 15:09 - 15:11
    जहाँ एक समय पर लोग
  • 15:11 - 15:13
    मेरी तरफ़ देखने में भी झिझकते थे।"
  • 15:13 - 15:16
    ये है अब्राहम-पथ की शक्ति।
  • 15:16 - 15:18
    और ऐसे कई सौ समुदाय है
  • 15:18 - 15:21
    पूरे मध्य-पूर्व में , इस रास्ते के आसपास।
  • 15:22 - 15:25
    देखिये इसमें संभावना है पूरा मुद्दा बदल देने की
  • 15:25 - 15:27
    और मुद्दा बदलने के लिये आपको माहौल बदलना होगा,
  • 15:27 - 15:29
    जिस तरह हम देखते हैं--
  • 15:29 - 15:31
    माहौल बदलना होगा
  • 15:31 - 15:34
    दुश्मनी से दोस्ती में
  • 15:34 - 15:37
    आतंकवाद से पर्यटन में।
  • 15:37 - 15:39
    और उस हिसाब से, अब्राहम पथ
  • 15:39 - 15:41
    मुद्दा बदलने की संभावना से ओत-प्रोत है।
  • 15:41 - 15:43
    चलिये मैं आपको कुछ दिखाता हूँ।
  • 15:43 - 15:45
    मेरे पास एक छोटा सा बाँजफ़ल है
  • 15:45 - 15:47
    जो मैनें ऐसे ही रास्ते पर चलते हुए उठा लिया था
  • 15:47 - 15:49
    इस साल की शुरुवात में।
  • 15:49 - 15:51
    अब ये फ़ल बलूत के पेड से जुडा है, बिलकुल --
  • 15:51 - 15:53
    क्योंके ये उस पर उगता है,
  • 15:53 - 15:55
    जो कि अब्राहम से जुडा है।
  • 15:55 - 15:57
    ये पथ आज इस फ़ल की तरह है;
  • 15:57 - 15:59
    अपने शुरुवाती दौर में।
  • 15:59 - 16:01
    और बलूत का पूरा पेड कैसा दिखेगा?
  • 16:01 - 16:03
    जब मैं अपने बचपन के बारे में सोचता हूँ,
  • 16:03 - 16:05
    जिसका काफ़ी बडा हिस्सा मैने, शिकागो में पैदा होने के बावजूद,
  • 16:05 - 16:07
    यूरोप में गुज़ारा।
  • 16:07 - 16:09
    अगर आप
  • 16:09 - 16:11
    मान लीजिये, कि लंदन के खंडहरों
  • 16:11 - 16:14
    में १९४५ मे, या फ़िर बर्लिन मे, गये होते,
  • 16:14 - 16:16
    तो आपने कहा होता,
  • 16:16 - 16:18
    आज से साठ साल बाद,
  • 16:18 - 16:20
    ये धरती का सबसे शांत, सबसे धनी इलाका होगा,"
  • 16:20 - 16:22
    तो लोग सोचते कि
  • 16:22 - 16:24
    आप निश्चय ही पागल हैं।
  • 16:24 - 16:28
    मगर ऐसा हुआ - यूरोप की एक साझी पहचान के चलते,
  • 16:28 - 16:30
    और एक साझी अर्थव्यवस्था के चलते।
  • 16:30 - 16:33
    तो मेरा प्रश्न है, कि यदि ये यूरोप में किया जा सकता है,
  • 16:33 - 16:35
    तो मध्य-पूर्व में क्यों नहीं?
  • 16:35 - 16:37
    क्यों नहीं, जबकि वहाँ भी एक साझी पहचान है --
  • 16:37 - 16:39
    जो कि अब्राहम की कहानी से आती है --
  • 16:39 - 16:41
    और ऐसी साझी अर्थव्यवस्था से
  • 16:41 - 16:44
    जो कि पर्यटन पर टिकी हो?
  • 16:45 - 16:47
    मैं अंत में यही कहूँगा कि
  • 16:47 - 16:50
    पिछले ३५ सालों में,
  • 16:50 - 16:52
    मैने काम किया है
  • 16:52 - 16:54
    कुछ बहुत ही खतरनाक, कठिन और उलझे हुए विवादों
  • 16:54 - 16:56
    - पूरे विश्व में,
  • 16:56 - 16:59
    और आज तक मैं ऐसे विवाद को नहीं देख सका
  • 16:59 - 17:02
    जिसे देख कर मुझे लगा हो कि ये हल नहीं हो पायेगा।
  • 17:02 - 17:04
    बिलकुल, ये आसान नहीं है,
  • 17:04 - 17:06
    लेकिन ये संभव है।
  • 17:06 - 17:08
    ऐसा दक्षिणी अफ़्रीका में किया गया है।
  • 17:08 - 17:10
    उत्तरी आयरलैण्ड में भी किया गया है।
  • 17:10 - 17:12
    और ऐसा कहीं भी किया जा सकता है।
  • 17:12 - 17:14
    सब कुछ हम पर ही निर्भर करता है।
  • 17:14 - 17:17
    हमारा ही कर्तव्य है कि हम तीसरा पक्ष बनें।
  • 17:17 - 17:19
    तो मैं आप को आमंत्रित करता हूँ कि
  • 17:19 - 17:21
    तीसरे पक्ष की भूमिका निभाने को
  • 17:21 - 17:23
    एक छोटी शुरुवात के रूप में देखें।
  • 17:23 - 17:25
    थोडी ही देर में हम एक छोटा सा मध्यांतर लेंगे।
  • 17:25 - 17:27
    उस में किसी ऐसे से मिलिये
  • 17:27 - 17:30
    जो दूसरी संस्कृति, दूसरे देश से हो,
  • 17:30 - 17:32
    अलग जाति से हो, कुछ अलग हो,
  • 17:32 - 17:35
    और उनके साथ बातचीत कीजिये; उन्हें ध्यान से सुनिये।
  • 17:35 - 17:37
    यही तीसरे पक्ष का कार्य है।
  • 17:37 - 17:39
    यही अब्राहम के नक्श-ए-कदम पर चलना है।
  • 17:39 - 17:41
    टेडवार्ता की बाद,
  • 17:41 - 17:43
    क्यों न एक टेडयात्रा भी करें?
  • 17:43 - 17:45
    जाते जाते मैं आपको
  • 17:45 - 17:47
    तीन संदेश दे कर जाऊँगा।
  • 17:47 - 17:50
    एक, ये कि शांति का राज़ है
  • 17:50 - 17:53
    तीसरा पक्ष।
  • 17:53 - 17:55
    और तीसरा पक्ष मै आप,
  • 17:55 - 17:57
    हम में हर एक है,
  • 17:57 - 17:59
    और एक छोटे से कदम से ही,
  • 17:59 - 18:02
    हम दुनिया को बदल सकते है, उसे
  • 18:02 - 18:05
    शांति के और करीब ला सकते हैं।
  • 18:05 - 18:07
    एक पुरानी अफ़्रीकन कहावत है:
  • 18:07 - 18:09
    "अगर मकडियों के जाले एकजुट हो जायें,
  • 18:09 - 18:12
    तो वो शेर को भी रोक सकते हैं।"
  • 18:12 - 18:14
    अगर हम सब एकत्र कर सकें,
  • 18:14 - 18:16
    अपने तीसरे पक्ष के जाले,
  • 18:16 - 18:19
    तो हम युद्ध के शेर को भी रोक सकते हैं।
  • 18:19 - 18:21
    बहुत बहुत धन्यवाद।
  • 18:21 - 18:23
    (तालियाँ अभिवादन)
Title:
विलियम ऊरी: 'ना' से 'हाँ' का सफ़र
Speaker:
William Ury
Description:

'गेटिंग टू येस' के लेखक विलियम ऊरी एक सहज और साधारण (पर आसान नहीं) सुझाव देते हैं कठिन से कठिन समय में भी मिलझुल कर सहमति बनाने का - चाहे पारिवारिक कलह हो, या फ़िर मध्य-पूर्व देशों की बडी समस्या।

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Video Language:
English
Team:
TED
Project:
TEDTalks
Duration:
18:24
Swapnil Dixit added a translation

Hindi subtitles

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