WEBVTT 00:00:00.000 --> 00:00:05.000 मैं संवेदना के बारे में इस्लाम के दृष्टिकोण से बात कर रहा हूँ, 00:00:05.000 --> 00:00:08.000 और शायद मेरे धर्म के बारे में ऐसा नहीं समझा जाता 00:00:08.000 --> 00:00:12.000 कि संवेदना से गहरे जुड़ा हुआ है. 00:00:12.000 --> 00:00:14.000 हालांकि सच्चाई कुछ अलग है NOTE Paragraph 00:00:14.000 --> 00:00:20.000 हमारे धर्मग्रन्थ क़ुरान में ११४ अध्याय हैं 00:00:20.000 --> 00:00:24.000 और हर अध्याय शुरू होता है उस शब्द से, जिसे हम कहते हैं बिस्मिल्लाह 00:00:24.000 --> 00:00:30.000 जो कि ईश्वर के नाम में, जो संवेदनापूर्ण हैं, और दयालु हैं 00:00:30.000 --> 00:00:32.000 या जैसा कि सर रिचर्ड बर्टन 00:00:32.000 --> 00:00:35.000 वो रिचर्ड बर्टन नहीं जिन्होंने एलिज़ाबेथ टेलर से शादी कि थी 00:00:35.000 --> 00:00:38.000 परन्तु वो सर रिचर्ड बर्टन जो उनसे १ शताब्दी पहले हुए थे 00:00:38.000 --> 00:00:40.000 और जिन्होंने पूरी दुनिया का भ्रमण किया था 00:00:40.000 --> 00:00:44.000 और कई साहित्यों का अनुवाद किया था 00:00:44.000 --> 00:00:51.000 वो उस शब्द का अनुवाद करते हैं " ईश्वर के नाम में, जो कि संवेदनशील और करुणापूर्ण हैं" NOTE Paragraph 00:00:51.000 --> 00:00:58.000 और क़ुरान, जो कि मुसलमानों के लिए ईश्वर का मानवता को सन्देश है, उसकी एक कहावत में, 00:00:58.000 --> 00:01:01.000 ईश्वर अपने पैगंबर मुहम्मद से, 00:01:01.000 --> 00:01:04.000 जिनको हम पैगम्बरों कि श्रृंखला में अंतिम मानते हैं 00:01:04.000 --> 00:01:10.000 उस श्रृंखला में जो आदम से शुरू हुई, और नूह, मूसा, इब्राहिम 00:01:10.000 --> 00:01:14.000 और यीशु मसीह भी शामिल है, और जो मोहम्मद के साथ समाप्त हुई 00:01:14.000 --> 00:01:17.000 कहते हैं " ओह मोहम्मद, हमने आपको भेजा है 00:01:17.000 --> 00:01:23.000 केवल दया, और मानवता के लिए संवेदना का स्रोत बना कर " NOTE Paragraph 00:01:23.000 --> 00:01:27.000 और हम मनुष्यों के लिए, और निश्चित रूप से हम मुसलमानों के लिए , 00:01:27.000 --> 00:01:32.000 जिनका लक्ष्य और उद्देश्य, पैगम्बर के रास्ते पर चल कर 00:01:32.000 --> 00:01:36.000 अपने आप को पैगम्बर की तरह बनाना है 00:01:36.000 --> 00:01:38.000 और पैगम्बर ने अपने एक कथन में कहा है 00:01:38.000 --> 00:01:43.000 "अपने आप को परमेश्वर के गुणों से सजाओ". 00:01:43.000 --> 00:01:49.000 और क्योंकि परमेश्वर ने खुद कहा है कि करुणा उनकी प्राथमिक गुण है , 00:01:49.000 --> 00:01:54.000 वास्तव में, कुरान में कहा गया है कि, "ईश्वर ने खुद पर करुणा का नियम बनाया ," 00:01:54.000 --> 00:01:58.000 या, "करुणा के राजत्व में रहे" 00:01:58.000 --> 00:02:05.000 इसलिए, हमारा उद्देश्य और हमारा लक्ष्य करुणा का स्रोत 00:02:05.000 --> 00:02:09.000 करुणा के उत्प्रेरक, करुणा के पात्र , 00:02:09.000 --> 00:02:13.000 करुणा के वक्ता और करुणा के कर्ता बनना होना चाहिए. NOTE Paragraph 00:02:13.000 --> 00:02:16.000 यह सब तो ठीक है, 00:02:16.000 --> 00:02:19.000 पर हम गलत कहाँ हो जाते हैं, 00:02:19.000 --> 00:02:24.000 और दुनिया में करुणा की कमी का स्रोत क्या है? 00:02:24.000 --> 00:02:29.000 इसका जवाब जानने के लिए, हमे मुड़ कर देखना होगा अपने आध्यात्मिक पथ की ओर 00:02:29.000 --> 00:02:36.000 हर धार्मिक परंपरा में एक बाहरी और एक आंतरिक पथ होता हैं, 00:02:36.000 --> 00:02:41.000 या कहें की भीतर की चेतना और बाहर की चेतना का पथ 00:02:41.000 --> 00:02:49.000 भीतर की चेतना के पथ को इस्लाम में सूफ़ीवाद, या अरबी में तसव्वुफ़ कहा जाता है 00:02:49.000 --> 00:02:52.000 और ये हकीम या ये गुरु, 00:02:52.000 --> 00:02:56.000 सूफी परंपरा के ये आध्यात्मिक गुरु, 00:02:56.000 --> 00:03:00.000 हमारे पैगम्बर की शिक्षाओं और उदाहरणों को उद्धृत करते हैं, 00:03:00.000 --> 00:03:04.000 जो हमें सिखाता है कि हमारी समस्याओं का स्रोत कहाँ है, NOTE Paragraph 00:03:04.000 --> 00:03:08.000 पैगम्बर ने जो युद्ध लड़े उनमें से एक में, 00:03:08.000 --> 00:03:13.000 उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा, "हम छोटे युद्ध से लौट रहे हैं 00:03:13.000 --> 00:03:17.000 एक बड़ी लड़ाई, एक बड़े युद्ध की ओर." NOTE Paragraph 00:03:17.000 --> 00:03:22.000 और उन्होंने कहा, " ईश्वर के सन्देश वाहक, हम युद्ध से थक चुके हैं, 00:03:22.000 --> 00:03:25.000 हम एक बड़े युद्ध में कैसे जा सकते हैं?" NOTE Paragraph 00:03:25.000 --> 00:03:33.000 उन्होंने कहा, "यह आत्म की लड़ाई है, अहंकार की लड़ाई है." 00:03:33.000 --> 00:03:42.000 मनुष्य की समस्याओं के स्रोत का लेना देना अहंकारवाद से है. मैं. NOTE Paragraph 00:03:42.000 --> 00:03:48.000 प्रख्यात सूफी गुरु रूमी, आप में से ज्यादातर जिसे अच्छी तरह जानते हैं. 00:03:48.000 --> 00:03:54.000 की एक कहानी है जिसमे वह एक आदमी की बात करते हैं जो अपने एक दोस्त के घर जाता है 00:03:54.000 --> 00:03:57.000 और दरवाज़ा खटखटाता है, 00:03:57.000 --> 00:04:00.000 और एक आवाज़ जवाब देती है, " कौन है?" NOTE Paragraph 00:04:00.000 --> 00:04:05.000 "हम हैं", या व्याकरण के लिहाज से ज्यादा सही, "यह मैं हूँ." 00:04:05.000 --> 00:04:07.000 जैसा कि हम अंग्रेजी में कह सकते हैं. NOTE Paragraph 00:04:07.000 --> 00:04:10.000 वह आवाज़ कहती है,"चले जाओ." NOTE Paragraph 00:04:10.000 --> 00:04:18.000 कई वर्षों के प्रशिक्षण, अनुशासन, खोज और संघर्ष, के बाद, 00:04:18.000 --> 00:04:20.000 वह वापस आता है, 00:04:20.000 --> 00:04:24.000 और काफी ज्यादा विनम्रता से फिर दरवाजा खटखटाता है NOTE Paragraph 00:04:24.000 --> 00:04:27.000 वह आवाज़ पूछती हैं "कौन है वहां?" NOTE Paragraph 00:04:27.000 --> 00:04:31.000 वह कहता है, "ये तुम हो, ओ दिल तोड़ने वाले." NOTE Paragraph 00:04:31.000 --> 00:04:35.000 दरवाज़ा खुलता है और आवाज़ कहती है, 00:04:35.000 --> 00:04:42.000 "अन्दर आ जाओ, क्योंकि इस घर में दो 'मैं' के लिए जगह नहीं है. 00:04:42.000 --> 00:04:46.000 दो बड़े मैं, ये आँखें नहीं, बल्कि दो अहंकार. NOTE Paragraph 00:04:46.000 --> 00:04:55.000 और रूमी की कहानियां आध्यात्म के मार्ग की उपमा हैं. 00:04:55.000 --> 00:05:01.000 ईश्वर की उपस्थिति में एक से ज्यादा मैं की जगह नहीं. 00:05:01.000 --> 00:05:06.000 और यह मैं देवत्व का है. 00:05:06.000 --> 00:05:10.000 हमारी परंपरा में एक शिक्षा जिसे हदीस ख़ुदसी कहते हैं, 00:05:10.000 --> 00:05:16.000 ईश्वर कहते है, "मेरे सेवक", या "मेरे जीव, मेरे मानव जीव, 00:05:16.000 --> 00:05:22.000 जो मुझे प्यारा है उसके सहारे मेरे पास नहीं आता 00:05:22.000 --> 00:05:25.000 बल्कि उसके सहारे जो मैंने करने को कहा है 00:05:25.000 --> 00:05:29.000 और आप में से जो नियोक्ता हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं की मैं क्या कहना चाहता हूँ 00:05:29.000 --> 00:05:33.000 आप चाहते हो कि आपके कर्मचारी वह ही करें जो आपने उनसे करने को कहा है, 00:05:33.000 --> 00:05:35.000 और अगर उन्होंने वह कर लिया तो वे और ज्यादा कर सकते हैं, 00:05:35.000 --> 00:05:38.000 लेकिन उसे नज़रंदाज़ मत करना कि तुमने उनसे क्या करने को कहा है, NOTE Paragraph 00:05:38.000 --> 00:05:44.000 और ईश्वर कहते है, मेरे सेवक मेरे और करीब होते जाते हैं, 00:05:44.000 --> 00:05:47.000 मैंने जो उनसे करने को कहा है, उससे ज्यादा कुछ करके, 00:05:47.000 --> 00:05:49.000 हम उसे कुछ ज्यादा साख कह सकते हैं, 00:05:49.000 --> 00:05:53.000 जब तक मैं उसको प्यार नहीं करता, 00:05:53.000 --> 00:05:56.000 और जब मैं अपने सेवकों को प्यार करता हूँ", ईश्वर कहते हैं, 00:05:56.000 --> 00:06:02.000 मैं वो आँखें बन जाता हूँ, जिनसे वह देखते हैं. 00:06:02.000 --> 00:06:08.000 कान जिनसे वह सुनते हैं. 00:06:08.000 --> 00:06:13.000 हाथ जिससे वह पकड़ते हैं. 00:06:13.000 --> 00:06:17.000 पैर जिससे वह चलते हैं. 00:06:17.000 --> 00:06:22.000 और दिल जिससे वह समझता या समझती हैं." 00:06:22.000 --> 00:06:27.000 यह हमारे अहम् और देवत्व का वह समामेलन है. 00:06:27.000 --> 00:06:35.000 यह हमारे अध्यात्मिक मार्ग और हमारी सभी धार्मिक परम्पराओं का उद्देश्य और सबक है. NOTE Paragraph 00:06:35.000 --> 00:06:41.000 मुसलमान यीशु को सूफीवाद का गुरु मानते हैं, 00:06:41.000 --> 00:06:48.000 महानतम पैगम्बर और संदेशवाहक जो आध्यात्मिक मार्ग पर जोर देने आया. 00:06:48.000 --> 00:06:52.000 जब वह कहता है, " मैं आत्मा हूँ, मैं रास्ता हूँ." 00:06:52.000 --> 00:06:57.000 जब पैगम्बर मोहम्मद कहते हैं, "'जिसने मुझे देखा है उसने ईश्वर को देख लिया," 00:06:57.000 --> 00:07:02.000 ऐसा इस लिए क्यों कि वे ईश्वर के पुर्जे बन गए, 00:07:02.000 --> 00:07:04.000 वे ईश्वर की वाष्प का हिस्सा बन गए, 00:07:04.000 --> 00:07:08.000 ताकि ईश्वर की इच्छा उनके जरिये फ़ैली 00:07:08.000 --> 00:07:12.000 अपने स्व और अहम् के जरिये काम नहीं किया. 00:07:12.000 --> 00:07:19.000 धरती पर मानवीयता दी गयी है, यह हममें है. 00:07:19.000 --> 00:07:24.000 हमें बस यही करना है कि रास्ते से अपने अहम् हटा देना है, 00:07:24.000 --> 00:07:27.000 अपने अहंकरवाद रास्ते से हटा देना है. NOTE Paragraph 00:07:27.000 --> 00:07:35.000 में निश्चित हूँ कि यहाँ मौजूद आप में से संभवतः सभी, या निश्चित ही आप में से बहुसंख्य, 00:07:35.000 --> 00:07:39.000 को हुआ होगा, जिसे आप आध्यात्मिक अनुभव कहते हैं, 00:07:39.000 --> 00:07:46.000 आपके जीवन में एक लम्हा, जब कुछ सेकंडों या शायद एक मिनट को, 00:07:46.000 --> 00:07:52.000 आपके अहम् की सीमायें ख़त्म हो गयीं,. 00:07:52.000 --> 00:07:59.000 और उस मिनट आपने खुद को ब्रह्माण्ड का हिस्सा महसूस किया, 00:07:59.000 --> 00:08:05.000 उस पानी से भरे जग में, हर एक इन्सान में, 00:08:05.000 --> 00:08:09.000 परम पिता में, 00:08:09.000 --> 00:08:14.000 और तुमने स्वयं को शक्ति, विस्मय के सानिध्य में पाया, 00:08:14.000 --> 00:08:18.000 सबसे गहरे प्यार, संवेदना और दया की सबसे गहरी भावना में 00:08:18.000 --> 00:08:22.000 जो तुमने अपनी जिंदगी में कभी महसूस किया है NOTE Paragraph 00:08:22.000 --> 00:08:28.000 ये वह लम्हा है जो ईश्वर का हमें तोहफा है, 00:08:28.000 --> 00:08:32.000 एक तोहफा जब एक लम्हे के लिए वह सीमा हटा देता है, 00:08:32.000 --> 00:08:38.000 जो हमें मैं, मैं, मैं, हम, हम हम पर जोर देने देता है, 00:08:38.000 --> 00:08:42.000 और इसके विपरीत, रूमी की कहानी के व्यक्ति की तरह, 00:08:42.000 --> 00:08:48.000 हम कहते हैं, ' ओह, ये सब तुम हो. ' 00:08:48.000 --> 00:08:50.000 यह सब तुम हो, यह हम सब हैं. 00:08:50.000 --> 00:08:56.000 और हम, और मैं, हम सब तुम्हारे अंश हैं, 00:08:56.000 --> 00:09:02.000 सब निर्माता, सब उद्देश्य, हमारे अस्तित्व का स्रोत, 00:09:02.000 --> 00:09:04.000 और हमारी यात्रा का अंत. 00:09:04.000 --> 00:09:09.000 तुम हमारे दिलों को तोड़ने वाले भी हो. 00:09:09.000 --> 00:09:15.000 तुम वो हो जिसकी ओर हम सबको होना चाहिए, जो हमारे जीने का कारण होना चाहिए, 00:09:15.000 --> 00:09:19.000 और जिसके लिए हमें मरना चाहिए, 00:09:19.000 --> 00:09:23.000 औए जिसके लिए हमें पुनर्जन्म लेना चाहिए. 00:09:23.000 --> 00:09:30.000 ईश्वर को जवाब देने के लिए कि हम संवेदनशील रहे हैं. NOTE Paragraph 00:09:30.000 --> 00:09:34.000 आज हमारा सन्देश, और आज हमारा उद्देश्य, 00:09:34.000 --> 00:09:37.000 और तुममे में से जो आज यहाँ हैं, 00:09:37.000 --> 00:09:42.000 और संवेदना के इस अधिकारपत्र का उद्देश्य याद दिलाना है. 00:09:42.000 --> 00:09:50.000 क्योंकि कुरान हमेशा हमें याद रखने को, एक दूसरे को याद दिलाने को कहती है, 00:09:50.000 --> 00:09:58.000 क्योंकि सत्य का ज्ञान हर एक इंसान के भीतर है. NOTE Paragraph 00:09:58.000 --> 00:10:01.000 हम यह सब जानते हैं. 00:10:01.000 --> 00:10:03.000 हमारे पास इसका जरिया है. 00:10:03.000 --> 00:10:07.000 जंग इसे अवचेतना कह सकते थे. 00:10:07.000 --> 00:10:11.000 हमारी अवचेतना के जरिये, तुम्हारे ख्वाबों में, 00:10:11.000 --> 00:10:19.000 जिसे कुरान कहती है, हमारी निद्रा की स्थिति, अल्प मौत, 00:10:19.000 --> 00:10:23.000 अस्थाई मौत. 00:10:23.000 --> 00:10:28.000 अपनी निद्रा की स्थिति में हमें स्वप्न आते हैं, हमें आभास होता है, 00:10:28.000 --> 00:10:34.000 हम अपने शरीर के बाहर यात्रा करते हैं, हममे से बहुत, 00:10:34.000 --> 00:10:37.000 और हम अद्भुत चीजें देखते हैं. 00:10:37.000 --> 00:10:42.000 हम जैसा अंतरिक्ष जानते हैं, उसकी सीमाओं के परे यात्रा करते हैं, 00:10:42.000 --> 00:10:46.000 हम समय की जो सीमायें जानते हैं उसके परे. 00:10:46.000 --> 00:10:56.000 लेकिन यह सब हमारे लिए विधाता के नाम का गुणगान करने के लिए है 00:10:56.000 --> 00:11:02.000 जिसका मूल नाम दयावान, दयालु है. NOTE Paragraph 00:11:02.000 --> 00:11:09.000 गौड, बोख, चाहे जिस नाम से पुकारो, अल्ला, राम, ॐ, 00:11:09.000 --> 00:11:12.000 नाम कोई भी हो सकता है जिससे तुम नाम देते हो 00:11:12.000 --> 00:11:16.000 या देवत्व की मौजूदगी प्राप्त करते हो, 00:11:16.000 --> 00:11:22.000 पूर्ण तत्व का केंद्र बिंदु है. 00:11:22.000 --> 00:11:26.000 पूर्ण प्रेम और दया और संवेदना, 00:11:26.000 --> 00:11:29.000 और पूर्ण ज्ञान और विवेक, 00:11:29.000 --> 00:11:32.000 जिसे हिन्दू सच्चिनंद कहते हैं. 00:11:32.000 --> 00:11:35.000 भाषा अलग है, 00:11:35.000 --> 00:11:39.000 पर उद्देश्य समान है. NOTE Paragraph 00:11:39.000 --> 00:11:41.000 रूमी के पास एक और कहानी है 00:11:41.000 --> 00:11:44.000 तीन लोगों के बारे में, एक तुर्क, एक अरब, 00:11:44.000 --> 00:11:48.000 और मैं तीसरे का नाम भूल गया, पर मेरे वास्ते, वह एक मलय हो सकता है. 00:11:48.000 --> 00:11:51.000 कोई अंगूर मांग रहा है, जैसे कि एक अंग्रेज़, 00:11:51.000 --> 00:11:56.000 कोई एनेब मांग रहा है और कोई ग्रेप्स मांग रहा है. 00:11:56.000 --> 00:11:59.000 और उनमें झगडा और बहस होती है क्योंकि, 00:11:59.000 --> 00:12:03.000 मुझे ग्रेप्स चाहिए, मुझे एनेब चाहिए, मुझे अंगूर चाहिए, 00:12:03.000 --> 00:12:06.000 यह जाने बगैर कि जिस शब्द का वह इस्तेमाल कर रहे हैं 00:12:06.000 --> 00:12:09.000 वह एक ही सच्चाई को अलग अलग भाषाओँ में बताता है. NOTE Paragraph 00:12:09.000 --> 00:12:15.000 परिभाषा के अनुसार सिर्फ एक ही पूर्ण सच्चाई है, 00:12:15.000 --> 00:12:18.000 परिभाषा के अनुसार एक पूर्ण अस्तित्व है, 00:12:18.000 --> 00:12:21.000 क्योंकि परिभाषा के अनुसार पूर्ण, एकल है, 00:12:21.000 --> 00:12:24.000 और पूर्ण और एकल,. 00:12:24.000 --> 00:12:27.000 यह अस्तित्व का पूर्ण केन्द्रीकरण है, 00:12:27.000 --> 00:12:30.000 अवचेतना का पूर्ण केन्द्रीकरण है, 00:12:30.000 --> 00:12:40.000 जागरूकता, संवेदना और प्रेम का पूर्ण केन्द्रीकरण 00:12:40.000 --> 00:12:44.000 जो देवत्व के मूल भाव को पारिभाषित करता है. NOTE Paragraph 00:12:44.000 --> 00:12:47.000 और वह होना भी चाहिए 00:12:47.000 --> 00:12:52.000 इन्सान होने का जो मतलब है, उसका मूल भाव. 00:12:52.000 --> 00:12:58.000 जो इंसानियत को पारिभाषित करता है, शायद शारीरिक रूप से, 00:12:58.000 --> 00:13:01.000 हमारा जीवतत्व है, 00:13:01.000 --> 00:13:09.000 लेकिन ईश्वर हमारी इंसानियत को हमारे अध्यात्म से, हमारी प्रकृति से पारिभाषित करता है. NOTE Paragraph 00:13:09.000 --> 00:13:13.000 और कुरान कहती है, वह फरिश्तों से बात करता है और कहता है, 00:13:13.000 --> 00:13:17.000 जब मैंने मिट्टी से आदम का निर्माण पूरा कर लिया, 00:13:17.000 --> 00:13:21.000 और अपनी आत्मा से उसमें सांस फूंकी, 00:13:21.000 --> 00:13:25.000 और उसके सामने साष्टांग गिर गया. " 00:13:25.000 --> 00:13:33.000 फ़रिश्ते साष्टांग होते हैं, लेकिन मानव शारीर के समक्ष नहीं, 00:13:33.000 --> 00:13:36.000 बल्कि मानव आत्मा के समक्ष. 00:13:36.000 --> 00:13:40.000 क्यों? क्योंकि आत्मा, मानव आत्मा, 00:13:40.000 --> 00:13:46.000 दैवी श्वास के एक हिस्से का मूर्त रूप है, 00:13:46.000 --> 00:13:49.000 दैवी आत्मा का एक टुकड़ा है . NOTE Paragraph 00:13:49.000 --> 00:13:54.000 यह बाईबिल के कोष में भी वर्णित है 00:13:54.000 --> 00:14:00.000 जब हमें यह सिखाया जाता है कि हम दैवी तस्वीर में बनाये गए थे. 00:14:00.000 --> 00:14:02.000 ईश्वर का चित्र क्या है? 00:14:02.000 --> 00:14:06.000 ईश्वर का चित्र पूर्ण अस्तित्व है. 00:14:06.000 --> 00:14:09.000 पूर्ण जागरूकता, ज्ञान और विवेक 00:14:09.000 --> 00:14:12.000 और पूर्ण संवेदना और प्रेम. NOTE Paragraph 00:14:12.000 --> 00:14:16.000 और, इसलिए, हमें इन्सान होने के लिए, 00:14:16.000 --> 00:14:20.000 इन्सान होने का क्या मतलब है इसके सबसे बड़े मायने में, 00:14:20.000 --> 00:14:23.000 इन्सान होने का क्या मतलब है इसके सबसे खुशनुमा मायने में, 00:14:23.000 --> 00:14:29.000 मतलब यह है कि हमें उचित कारिन्दा होना पड़ेगा 00:14:29.000 --> 00:14:33.000 हमारे भीतर जो दैवी श्वास है उसका, 00:14:33.000 --> 00:14:38.000 और हमारे भीतर अस्तित्व के भाव के साथ परिपूर्ण होने के प्रयास, 00:14:38.000 --> 00:14:41.000 जीवित होने के, अस्तित्व के, 00:14:41.000 --> 00:14:46.000 विवेक के भाव, चेतना के, जागरूकता के, 00:14:46.000 --> 00:14:51.000 और भाव संवेदनशील होने का, प्रेम भरा होने का. NOTE Paragraph 00:14:51.000 --> 00:14:57.000 यही है वह जो मैं अपने धर्म की परम्पराओं से समझता हूँ, 00:14:57.000 --> 00:15:04.000 यही है वह जो मैं दूसरे धर्म की परम्पराओं के अपने अध्धयन से समझता हूँ, 00:15:04.000 --> 00:15:10.000 और यह एक समान मंच है जिस पर हम सबको जरूर खड़े होना चाहिए, 00:15:10.000 --> 00:15:13.000 और इस मंच पर जब हम ऐसे खड़े होंगे, 00:15:13.000 --> 00:15:19.000 मुझे यकीन है कि हम एक अद्भुत दुनिया बना सकते हैं. NOTE Paragraph 00:15:19.000 --> 00:15:25.000 और मुझे व्यक्तिगत तौर पर विश्वास है कि हम कगार पर हैं, 00:15:25.000 --> 00:15:29.000 कि आप जैसे लोग जो यहाँ हैं उनकी उपस्थिति और मदद से, 00:15:29.000 --> 00:15:35.000 हम ईसा की भविष्यवाणी को सच बना सकते हैं. 00:15:35.000 --> 00:15:39.000 क्यों कि उसने एक समय के बारे में बताया था 00:15:39.000 --> 00:15:46.000 जब लोग अपनी तलवारों को हल के फल में बदल देंगे 00:15:46.000 --> 00:15:52.000 और न युध्द सीखेंगे और न और कभी युध्द करेंगे. NOTE Paragraph 00:15:52.000 --> 00:15:58.000 हम मानव इतिहास में ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं, जब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. 00:15:58.000 --> 00:16:07.000 हमें जरूर, जरूर ही अपने अहम् को गिराना होगा, 00:16:07.000 --> 00:16:12.000 हमारे अहम् पर नियंत्रण, चाहे वह एक का अहम् हो, व्यक्तिगत अहम् हो, 00:16:12.000 --> 00:16:18.000 परिवार का अहम्, राष्ट्र का अहम्, 00:16:18.000 --> 00:16:23.000 और सब परमेश्वर के गुणगान में जुटें, NOTE Paragraph 00:16:23.000 --> 00:16:25.000 धन्यवाद्, ईश्वर आपको आशीर्वाद दे. 00:16:25.000 --> 00:16:26.000 (तालियों की ध्वनि)