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वधिरों के लिए शिक्षा एवं रोज़गार। रुमा रोका

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    कुछ भी समझ नहीं पाए आप, है न ?
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    [हँसी]
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    वर्तमान भारत में 18 करोड़ श्रवण दिव्यांग है
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    जो इस कष्ट में जीते है
    साल दर-साल, दिन-प्रति-दिन,
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    उस दुनिया को समझने की कोशिश
    में, जिसे वे सुन नहीं सकते।
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    जागरूकता की भारी कमी और
    सामाजिक कलंक
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    उस नवजात के होने की,
    जो दिव्यांग है
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    अभिभावक मारे-मारे फिरते हैं
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    के किस प्रकार शिशु का
    पालन-पोषण करें
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    और उन्हें बताया जाता है
    यद्यपि वे सुन नहीं सकते
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    उनके ध्वनि-अंग ख़राब
    नहीं है।
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    उनके स्वर-रज्जु बेक़ार नहीं हैं।
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    और उन्हें अंततः सिखाया जा सकता है
    किस प्रकार बोलना सीखें।
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    एक यात्रा आरम्भ होती है और
    वर्षों बीत जाते हैं, सिखाने की कोशिश में,
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    इन नन्हें बालकों को, सुस्पष्ट उच्चारण
    उन अश्रवणीय शब्दों का।
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    यहाँ तक की परिवार में भी
    यह नन्हा बालक चाहता है
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    अपने अभिभावक से संवाद करना
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    उसे भी हिस्सा बनना है
    पारिवारिक वार्तालाप का।
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    पर वह असहाय समझ नहीं पाता
    क्यूँ कोई भी उसकी नहीं सुन रहा?
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    अतः वह खुद को अकेला
    पाता है और चूक जाता है
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    इस निर्णायक योग्यता को पाने में
    जो एक जरुरत है हमारी, बढ़ने पर।
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    वह रोज स्कूल जाता है
    इस आशा के साथ की अब परिस्थितियां बदलेगी
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    किन्तु वह देखता है, अपने अध्यापकों के
    मुख खुलते और बंद होते
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    और विचित्र चीज़ें लिखते,
    तख़्ती पर।
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    बिना समझे,
    क्यूंकि वे सुन नहीं सकते,
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    उसे अपने कॉपी पर छापते है
    और परीक्षा-काल में उलट देते है
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    और किसी प्रकार रटकर और कुछ अनुग्रह पर
    ये स्कूल की पढाई ख़त्म करते हैं, १०वीं तक।
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    इनके रोजगार पाने की संभावना क्या होगी?
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    इस बच्चे को देखिये,
    कोई वास्तविक ज्ञान नहीं,
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    दृश्य शब्द, तीस से चालीस
    शब्दों की शब्दावली
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    वह भावनात्मक रूप से असुरक्षित है, और शायद
    पूरी दुनिया से ख़फा भी,
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    जिसने, वे महसूस करते है, उन्हें जान-बुझ कर
    लाचार बना दिया गया।
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    वे कहाँ और कैसे काम करें?
    तुच्छ, कौशलविहीन कार्य,
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    प्रायः अपमानजनक स्थितियों में।
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    यहाँ से मेरे नए जन्म की यात्रा २००४ से
    शुरु होती है। जैसा केली ने बताया,
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    परिवार में कोई दिव्यांग नहीं है।
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    सिर्फ एक विचित्र खिंचाव
    और, कोई तर्कसंगत सोच नहीं।
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    मैं इनकी दुनिया में कूद पड़ी
    और सांकेतिक भाषा सीखा।
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    उस वक्त, यह एक चुनौती थी।
    कोई नहीं चाहता था, शायद ही कोई जानता था,
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    "यह क्या है जो तुम सीखना चाहती हो, रुमा?
    यह कोई भाषा है?"
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    फिर भी, सांकेतिक भाषा सीखकर
    मेरी ज़िंदगी इस समुदाय के लिए खुल गयी
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    जो बाहर से शांत दिखती है,
    पर भरी पड़ी है
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    जुनून और जिज्ञासा से
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    फिर मैंने उनकी कहानियों सुनी
    वे क्या बनना चाहते है।
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    एक साल बाद, २००५ में,
    ५००० डॉलर की छोटी पूंजी से,
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    जो एक बीमा योजना के पूरे होने पर मिली,
    मैंने इस केंद्र की शुरुआत की,
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    एक छोटे से दो कमरे के मकान में,
    सिर्फ ६ छात्रों के साथ
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    और मैं उन्हें अंग्रेजी सिखाती,
    सांकेतिक भाषा में।
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    चुनौतियाँ, प्राथमिकताएं
    उस वक्त की थी,
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    किस प्रकार इन,
    सिर्फ हाई स्कूल उत्तीर्ण, बच्चों को
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    कंपनियों में वास्तविक रोज़गार
    के लिए लगाया जाये?
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    गरिमापूर्ण नौकरी, नौकरी जो
    साबित करें बधिर मूर्ख नहीं हैं?
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    अतः, चुनौतियाँ अपार थी।
    उनका वर्षों का ठहराव,
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    वर्षों की विरक्ति और अंधकार।
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    इनकी आवश्यक्ता थी खुद पर विस्वास करने की।
    अभिभावकों को, आश्वस्त करने की
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    उनके बच्चें बधिर हैं पर मूर्ख नहीं।
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    और वे पूरी तरह से सक्षम है
    अपने दो पैरों पर खड़े होने में।
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    पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण,
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    क्या कोई कंपनी ऐसे व्यक्ति को
    कार्य के लिए चुनेगी जो मूक है,
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    सुन नहीं सकते, और काफी हद तक
    न लिख सकते है और न पढ़?
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    मैं अपने कुछ व्यावसायिक दोस्तों
    के साथ बैठी,
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    और अपनी कहानी उन्हें बताया
    मेरे लिए बधिर होने के क्या मायने है
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    और जाना कंपनियों में कुछ ऐसे
    निश्चित स्थान है
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    जहाँ ये कार्य कर सके,और
    कपनियों में उनका योगदान महत्वपूर्ण हो
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    और फिर अल्प साधनों से
    हमने सबसे प्रथम शुरुआत की
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    व्यावसायिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम
    बधिरों के लिए, देश में।
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    प्रशिक्षकों को ढूंढना एक समस्या थी।
    अतः मैंने इन्हें प्रशिक्षण दिया,
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    अपने छात्रों को, ताकि ये
    बधिरों के शिक्षक बनें।
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    और यह कार्य उन्होंने अपने हाथों में ली
    पूरी जिम्मेदारी और गर्व के साथ।
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    तथापि, नियोक्ता संशय में थे।
    इनकी शिक्षा, योग्यता, १०वीं पास।
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    "नहीं, नहीं, नहीं, रुमा,
    हम उन्हें काम नहीं दे सकते।"
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    वो एक बड़ी समस्या थी।
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    "और यदि हम उन्हें काम देते भी हैं,
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    हम उनसे संवाद कैसे स्थापित करेंगे?
    वे न तो पढ़-लिख सकते।
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    और न ही सुन-बोल सकते है।"
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    मैंने उनसे कहा, "कृपया क्या हम एक-एक
    करके कदम बढ़ा सकते है?
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    क्या हम अपना ध्यान, वो किस कार्य
    में सक्षम है,पर केंद्रित कर सकते है?
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Title:
वधिरों के लिए शिक्षा एवं रोज़गार। रुमा रोका
Description:

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Video Language:
English
Duration:
07:10
मयंक कुमार edited Hindi subtitles for Education and jobs for the deaf | Ruma Roka
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